जालोर
राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने को लेकर संघर्ष साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित ने कहा कि राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने में अपने ही लोग आड़े आ रहे हैं। साथ ही प्रदेश की सरकार पर भी अनदेखी करने का आरोप लगाया। वे गुरुवार को जालोर में एक निजी भवन में पत्रकारों से रूबरू होकर राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के बारे में चर्चा कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि बीते वर्ष केन्द्र सरकार में एक केबिनेट नोट तैयार हुआ, जिसमें तीन भाषाओं को मान्यता देनी थी। जिसमें भोजपुरी, राजस्थानी व भोटी भाषा शामिल थी, लेकिन उस समय गृह सचिव ने राजस्थानी को काटकर उस स्थान पर ब्रज भाषा कर दिया। सांसद अर्जुनराम मेघवाल ने उसका विरोध भी किया, जिसके बाद बड़ी मुश्किल से राजस्थानी भाषा का नाम शामिल किया गया, लेकिन बाद चुनावों में सरकार व्यस्त होने के कारण भाषा का मामला दब गया।
झारखंड की चार भाषाओं को मिल गई मान्यता, राजस्थानी को नहीं : उन्होंने कहा कि राजस्थान की सरकार निबली है, जिण कारण राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने में देरी हो रही है। उनका कहना था कि बीते वर्ष ही झारखंड की चार भाषाओं को मान्यता मिल गई, जबकि, उनमें से एक भी आठवीं अनुसूची में एक भी शामिल नहीं है, लेकिन राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिल पाई। इसके पीछे सरकार ही दोषी है। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों उन्होंने राजस्थानी भाषा को लेकर दिल्ली में आमरण अनशन किया था, जिसमें केन्द्र सरकार ने आगामी मानसून सत्र में राजस्थानी भाषा को मान्यता देने का भरोसा दिया है। मान्यता नहीं देने पर वापस आमरण अनशन किया जाएगा।
भाषा को मान्यता मिले तो होगा बड़ा फायदा
मान्यता मिलने से स्कूलों में पाठयक्रम होगा। ग्रामसेवक से लेकर उच्च पदाधिकारी तक सरकारी नौकरी का कोटा बढ़ेगा। कई लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
राजस्थान में दूसरी भाषा का दर्जा जरूरी
उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार की ओर से राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से पहले राजस्थान सरकार को राजस्थानी भाषा को दूसरा दर्जा देना चाहिए। आगामी चुनाव में आचार संहिता से पहले दर्जा नहीं दिया जाता है तो हमने एक लाख लड़कों को इंटरनेट के माध्यम से तैयार किया हुआ है, वे ‘म्हारे मन में खोट नहीं, भाषा नहीं तो वोट नहीं’ के नारे के साथ सरकार के विरुद्ध अपना मत नोटा को देंगे।
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